जिंदगी में मुश्किलों से सामना हर दिन-हर मोड़ पर करना पड़ता है, लेकिन हौसले के दम पर इन मुश्किलों की चुनौती से आगे बढ़ जाना ही हमें मंजिल तक पहुंचाता है। ऐसी ही मिसाल दी है मध्यप्रदेश के विदिशा (Madhya Pradesh Vidisha) जिले की सरजू बाई ने।

कुछ साल पहले सरजू बाई के पति पैरालाइज हो गए थे। वह चल नहीं सकते थे। कुछ काम नहीं कर सकते थे। इसके बाद एक साल पहले उनका निधन हो गया। इस दुख की घड़ी में भी सरजू बाई ने हार नहीं मानी और पंक्चर जोड़कर अपने बच्चों का पालन पोषण करने लगीं। सरजू बाई पिछले 20 साल से पंक्चर बनाकर परिवार पाल रही हैं।

सरजू बाई ने अपने दृढ़ निश्चय के साथ अपने पति के न रहने पर भी अपने बच्चों को कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी। विदिशा की सरजू बाई के पति का एक साल पहले निधन हो गया था। इसके बाद उनकी पत्नी, बेटे और बेटी बेसहारा हो गए। इसके बाद सरजू के सामने आजीविका चलाने की सबसे बड़ी समस्या खड़ी हो चुकी थी।

आजीविका का साधन मानकर करने लगी मेहनत

सरजू कहती हैं कि विकलांगता ने मेरे पति को तो मुझसे छीन लिया, लेकिन मैं हार जाऊंगी तो मेरे बच्चों को क्या होगा। मैंने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बना लिया है. सबसे पहले पंचर जोड़कर 10-10 रुपये से बचत की। उससे आटा लेकर परिवार पालती रही। फिर थोड़ी हिम्मत बढ़ी और पंक्चर की दुकान को ही अपनी आजीविका का साधन मानकर मेहनत करने लगी।

इस काम को ही आजीविका का साधन बना लिया, ताकि अब बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे पाऊं। सरजू पिछले 20 साल से पंक्चर जोड़कर अपने बच्चों का पालन पोषण कर रही हैं। उनका कहना है कि ये दुख उनके जीवन में परीक्षा की घड़ी है। बच्चे पढ़ लिख जाएंगे तो मेरी मेहनत कुछ हद तक तो सफल होगी।