छठ, वो महापर्व जिसका नाम सुनते ही हर बिहारी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। पूरा साल हर बिहारी जो बिहार से बाहर रहते हैं, पूरे साल छुट्टी इसलिए नहीं लेते क्योंकी छठ महाव्रत के शुभ अवसर पर छुट्टी मिल सके। छठ महापर्व हर बिहारी के भवन से जुड़ा हुआ पर्व है। अगर आपको इसकी अनुभूति करनी है, तो आप छठ के इस पावन महापर्व पे बिहार के भक्तिमय भूमि पे आकर देखें।

दुर्गा पूजा के बाद से ही शुरू हो जाती है छठ की तैयारी

दुर्गा पूजा के आते ही हर बिहारवासी के मन मे ये बात आ जाती है कि अब छठ महापर्व आ गया। छठ महापर्व हेतु हर वो सामग्री जो छठी मैया के व्रत में लगती है उसकी खरीदारी दुर्गा पूजा के बाद से ही शुरू हो जाती है। बिहार का हर नागरिक चाहे वो गरब हो या अमीर हो इस पर्व के दौरान एक दूसरे की मदद करने में लग जाते हैं। बांस का बट्टा, बांस एवं पीतल का सूप और हर वो सामग्री जो पूजा के विधि विधान में लगता है, उससे पूरा बाजार भर जाता है।

लोक एवं आस्था का महापर्व है छठ

छठ महापर्व के प्रति लोगों की ऐसी आस्था है कि लोग सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के लिए कई किलोमीटर पैदल खाली पैर चले जातें हैं। महीनों पूर्व से ही बिहार के हर कोने में छठ महापर्व की गीत सुनाई देते लगती है। हर कोने से बिहार आने वाले लोगों को ट्रेन में जगह मील या न मिले, कैसे भी करके लोग आते हैं। बिहार का हर गांव लोगो से भर जाता है। पूरा बिहार अपनो से इस छठ के सुबह अवसर पर एक दूर से,अपनो से मिल लेता है।

चार दिनों का होता है छठ महापर्व

प्रथम दिन को संजत (नहाय-खाय) कहते हैं।

द्वितीय दिन को लोहंडा (मुख्य प्रसाद) कहते हैं।

तृतीय दिन को उपास ( संध्या अर्घ्य) कहते हैं।

चतुर्थ दिन को पारण ( सुबह अर्घ्य) कहते हैं।