लोक आस्था के महापर्व छठ का मुंगेर से सीधा जुड़ाव रहा है। मान्यता है कि छठ की शुरुआत मुंगेर से ही हुई थी। लंका से लौटने के बाद माता सीता ने यहां छठ व्रत किया था। उसके बाद से ही देश के अन्य हिस्सों में यह पर्व मनाया जाने लगा। वाल्मीकि व आनंद रामायण में इस तथ्य का उल्लेख मिलता है। इसके प्रमाण-स्वरूप आज भी वहां माता सीता के पवित्र चरण चिन्ह मौजूद है। आज यह जगह सीताचरण के नाम से प्रसिद्ध है।

दियारा के ग्रामीणों ने 1974 में वहां मंदिर का निर्माण कराया है। यह मंदिर गंगा के बीचो-बीच स्थित है। इस संबंध में जेएमएस कॉलेज के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मिथिलेश कुमार ने बताया कि ऐतिहासिक मंदिर के इस सीताचरण स्थल पर मां सीता ने 6 दिनों तक रहकर छठ पूजा की थी। इस महत्ता के कारण छठ पूजा के अवसर पर इसके सामने स्थित बबुआ घाट पर आज भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। उसमें राज्य के विभिन्न जिलों समेत, झारखंड, दिल्ली आदि राज्यों और विदेश से आए श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।

वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब भगवान राम बनवास के लिए निकले थे, तब वे मां सीता और लक्ष्मण के साथ स्थानीय मुदृल ऋषि के आश्रम आए थे। उस वक्त मां सीता गंगा मां से वनवास काल सकुशल बीत जाने की प्रार्थना की थी। वनवास व लंका विजय के बाद भगवान राम व मां सीता फिर से मुदृल ऋषि के आश्रम आए थे। वहां से ऋषि ने माता सीता को सूर्य उपासना की सलाह दी थी। उन्हीं के कहने पर मां सीता ने वही गंगा नदी में एक टीले पर छठ व्रत किया था। कहा जाता है कि मां सीता ने यहां मुदृल ऋषि के आश्रम में रहकर उनके मार्गदर्शन में सूर्य उपासना का व्रत छठ किया था।

वहां के स्थानीय लोग बताते हैं कि 1974 में सीताचरण में संत समागम हुआ था। उसी के बाद में वहां मंदिर निर्माण की कवायद शुरू हुई थी। 1974 में यह मंदिर बनकर तैयार हुआ था। इससे पहले श्रद्धालु शिला पर बने मां सीता के पवित्र चरण चिन्ह की पूजा करते थे।