दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं जो विदेश में पढ़ने का सपना देखते हैं। जो लोग भी विदेश से पढ़ाई करते हैं वह यही चाहते हैं कि वह विदेश में ही नौकरी करें और अच्छे से पैसे कमाए। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने देश को छोड़कर नहीं जाना चाहते। वह देश की सेवा करके या कुछ काम करके रहना अपने देश में ही रहना चाहते हैं। इसी तरह की एक अफसर इलमा अफरोज की सफलता की कहानी के बारे में बताएंगे। जिन्होंने विदेश में पढ़कर ही आज यूपीएससी में 217 वी रैंक हासिल कर आईपीएस ऑफिसर बन कर अपना लक्ष्य पूरा किया।

IPS ऑफिसर इलमा अफरोज की संघर्ष की कहानी

मुरादाबाद के एक छोटे से गांव कुंदरकी से ताल्लुक रखने वाली इलमा अफरोज( Ilma afroj)।जो 2017 बैच की एक आईपीएस ऑफिसर हैं। जिन्होंने यूपीएससी में 217 रैंक हासिल किया था। इलमा अफरोज बहुत ही संघर्षों से पली-बढ़ी है। इलमा ने अपनी मेहनत के दम पर भारत की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी को पास कर एक इतिहास रच दिया।

वह शुरू से ही वकील बनना चाहती थी। लेकिन स्कॉलरशिप ना मिलने की वजह से उनका कोलंबिया यूनिवर्सिटी में एडमिशन नहीं हो पाया। इन सबके बावजूद उन्होंने अपने मेहनत के दम पर सब कुछ हासिल कर दिखाया।उनकी अम्मी उन्हे हमेशा से जीवन में संघर्ष एवं कड़ी मेहनत के लिए लड़ना सिखाया एवं चुनौतियों का सामना करना सिखाया।

इलमा अफरोज की पारिवारिक स्थिति

Ips ऑफिसर इल्मा की परिवारिक स्थिति बचपन से ही अच्छी नहीं थी।जब वह 14 वर्ष की थी तभी उनके इस दुनिया को छोड़ कर जा चुके थे।इल्मा अफरोज के दो भाई है जो उनसे 2 साल छोटे हैं। पिता का साया उठ जाने के बाद घर में कमाने वाला कोई नहीं था। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब हो गई। उनकी अम्मी को भी समझ नहीं आ रहा था कि परिवार की जिम्मेदारी को कैसे निभाए, तरह-तरह के सवाल उनके मन में पैदा हो रहे थे।

कुछ लोगों ने तो सलाह दी कि लड़की को पढ़ाने में पैसे खर्च ना करके इसकी शादी करा दी जाए। वह हमेशा सब की सुनती थी परंतु किसी को जवाब नहीं देती थी। सब की बातों को अनसुना कर उन्होंने दहेज के पैसे इकट्ठा करने के बजाए अपनी बेटी को पढ़ाया। अपनी मां को इतनी मेहनत करते देख इलमा भी बचपन से ही काफी मेहनत और लगन के साथ पढ़ाई करती थी और कक्षा में हमेशा आगे रहती थी।

स्कॉलरशिप के जरिए पढ़ाई की

उनकी पूरी पढ़ाई स्कॉलरशिप के जरिए ही हुई। उन्होंने बहुत ही लगन से स्कॉलरशिप को पाया और अपनी पढ़ाई की शुरुआत की। एक बार स्कॉलरशिप के काम से वह कलेक्ट्रेट ऑफिस गई थी। जहां पर ऑफिस के बाहर खड़ेेे सफेद यूनिफॉर्म मैं खड़े पहरेदार ने उनसे कहा कि “किसी बड़े को लाओ बच्चों का यहां क्या काम”। इल्मा उनके बातों को अनसुना कर सीधे अंदर चले गई। स्कूल की यूनिफार्मम में एक छात्रा को देख डीएम मुस्कुराने लगे और फॉर्म पर हस्ताक्षर करतेेे हुए बोले “इलमा सिविल सर्विसेज ज्वाइन करो”

दिल्ली सेंट स्टीफेंस से ऑक्सफोर्ड तक का सफर

इलमा अफरोज की पढ़ाई की शुरुआत दिल्ली स्टीफनेस कॉलेज से लेकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी तक हुई है। हालांकि इलमा को दिल्ली भेजने के बाद उनकी मां को लोगों के बहुत ताने सुनने पड़े। परन्तु उन्होंने किसी की बात नहीं सुनी और सिर्फ अपने मन की सुनी क्योंकि उन्हें अपनी बेटी पर पूरा भरोसा था।

सेंट स्टीफन के बाद मास्टर्स के लिए इलमा को ऑक्सफोर्ड जाने का मौका मिला। इसके बाद उनकी अम्मी को गांव वाले और रिश्तेदारों ने और भी ताने देना शुरू कर दिया। उन्होंने यह तक कह दिया कि ‘लड़की हाथ से निकल गई अब वापस नहीं आने वाली’। इल्मा यूके में अपने पढ़ाई के खर्च के लिए पार्ट टाइम काम करती थी जैसे – बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना,छोटे बच्चों की देखभाल करना यहां तक कि उन्होंने लोगों के घर के बर्तन भी धोये है क्योंकि वह किसी भी काम को छोटा मोटा नहीं समझती थी।

उन्होंने हर परिस्थिति का मुकाबला मुस्कुराते हुए किया है। किसी भी परिस्थिति में उन्होंने आंसू नहीं बहाए। कुछ समय बाद एक वॉलिंटियर प्रोग्राम में शामिल होने के लिए वह न्यूयॉर्क गई। जहां उन्हें एक बढ़िया जॉब का ऑफर मिला परंतु उन्होंने इस ऑफर को ठुकरा दिया क्योंकि वह अपने देश को छोड़कर नहीं रहना चाहती थी। उनका मानना था की वह आज जो कुछ भी है अपने देश के शुक्रगुजार से है जिससे उन्हें विदेश में पढ़ने के लिए स्कॉलरशिप दी।अपने UPSC की परीक्षा के परिणाम के दिन में भी इलमा खेतों में काम करती रही और अभी भी वह अपनी खेती बारी से जुड़ी रहती है।

विदेश की नौकरी छोड़ भारत आई

न्यूयॉर्क से वापस आने के बाद इल्मा ने upsc करने का ठाना। इसके लिए उनके भाई ने भी उन्हें प्रेरित किया। उनके गांव आने के बाद गांव वालों के अंदर एक अलग उम्मीद जाग उठी थी। उन्हें लगता था कि वह विदेश से पढ़ कर आई है अब गांव के सारी परेशानी खत्म हो जाएगी, किसी का राशन कार्ड बन जाएगा तो किसी को सरकारी योजना का लाभ मिल जाएगा।

हर कोई अपनी समस्या लेकर उनके पास आते थे परंतु वह इन सब से खुश नहीं थी।क्योंकि उनके मन में देश की सेवा करने का जुनून सवार था। इसलिए उन्होंने यूपीएससी चुना और देश की सेवा करने का मन बनाया। दिन रात मेहनत कर के उन्होंने यूपीएससी में 217 वी रैंक हासिल कर आईपीएस अफसर बना और अपनी मां का सपना और उनके संघर्षों को पूरा किया।