आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए आज एक आधुनिक दौर में शिक्षा एक सपने की तरह है। ये बच्चे आसानी से इस सपने को पूरा नहीं कर पाते हैं। ऐसे में अगर इस समुदाय से कोई आगे आता है तो वह अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए एक अच्छी मिसाल कायम करता है। सफलता किसी शोहरत और परिचय की मोहताज नहीं होती इसे चरितार्थ किया है इस आदिवासी छात्रा ने। अत्यंत पिछड़े इलाके से आने वाली आदिवासी छात्रा शांगवी मैं मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में सफलता हासिल कर कामयाबी की मिसाल पेश कर दी है। गांव की पहली 12वीं पांच छात्रा शांगवी ने दूसरे प्रयास में सफलता पाई है।

इस दौरान उन्होंने स्टेट बोर्ड की किताबें और एनजीओ से सहायता लिया तब जाकर उन्हें सफलता मिली। इन की प्रेरणादायक कहानी हम सभी को पढ़नी चाहिए। शांगवी कोयंबटूर के दूरदराज इलाके के आदिवासी समुदाय से आती हैं। 40 परिवार वाले गांव में शांगवी 12वीं पास पहली छात्रा है। शांगवी जिस समुदाय से आती है उस समुदाय में डॉक्टर बनना तो दूर लोग नर्स बनने तक का नहीं सोचते हैं। ऐसे में पिता के गुजरने के बाद भी शांगवी का डॉक्टर बनने की राह पर अग्रसर रहना अपने आप में बड़ी बात है।

शांगवी ने बताया कि उनके पिता के गुजरने के बाद उन्हें पता चला कि उनके समुदाय के लोगों को मेडिकल सहायता की कितनी जरूरत थी और लॉकडाउन से जूझ रही उनकी मां ने आंशिक रूप से आंखों की रोशनी भी खो दी थी। स्टेट बोर्ड की किताब का उपयोग करके और एनजीओ की सहायता से उन्होंने नीट परीक्षा पास की।

बता दें कि अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए कट-ऑफ इस वर्ष 108 से 137 के बीच है. जिसके चलते शांगवी का मानना है कि उन्हें किसी सरकारी मेडिकल कॉलेज में मेडिकल सीट मिल जाएगी। शांगवी को उस दौर से भी गुजरना पड़ा है जब सामुदायिक प्रमाण पत्र बनाने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी थी। बाद में डीएम के हस्तक्षेप के बाद उन्हें प्रमाण पत्र मिला था। शांगवी की यह कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो संसाधन के अभाव में अपने लक्ष्य से पीछे हट जाते हैं।